Saturday, March 19, 2011

रोहित की तस्वीरें






फोटो जर्नलिस्ट रोहित उमराव ने यह तस्वीरें अपने अखबारी समय से कुछ वक्त चुराकर हमें भेजी हैं। सौंदर्य के पारखी उमराव के पास चीजों को देखने समझने का दुस्साहसी नजरिया भी है। रोहित की तस्वीरों के मार्फत होली की शुभकामनाएं

फागुन की शाम


धर्मवीर भारती

घाट के रस्ते
उस बँसवट से
इक पीली-सी चिड़िया
उसका कुछ अच्छा-सा नाम है !
मुझे पुकारे !
ताना मारे,
भर आएँ, आँखड़ियाँ !
उन्मन, ये फागुन की शाम है !
घाट की सीढ़ी तोड़-तोड़ कर बन-तुलसा उग आयीं
झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं
तोतापंखी किरनों में हिलती बाँसों की टहनी
यहीं बैठ कहती थी तुमसे सब कहनी-अनकहनी


आज खा गया बछड़ा माँ की रामायन की पोथी !
अच्छा अब जाने दो मुझको घर में कितना काम है !


इस सीढ़ी पर, यहीं जहाँ पर लगी हुई है काई
फिसल पड़ी थी मैं, फिर बाँहों में कितना शरमायी !
यहीं न तुमने उस दिन तोड़ दिया था मेरा कंगन !
यहाँ न आऊँगी अब, जाने क्या करने लगता मन !


लेकिन तब तो कभी न हममें तुममें पल-भर बनती !
तुम कहते थे जिसे छाँह है, मैं कहती थी घाम है !
अब तो नींद निगोड़ी सपनों-सपनों भटकी डोले
कभी-कभी तो बड़े सकारे कोयल ऐसे बोले
ज्यों सोते में किसी विषैली नागिन ने हो काटा
मेरे सँग-सँग अकसर चौंक-चौंक उठता सन्नाटा


पर फिर भी कुछ कभी न जाहिर करती हूँ इस डर से
कहीं न कोई कह दे कुछ, ये ऋतु इतनी बदनाम है !


ये फागुन की शाम है !

इहां कुसल सब भांति सुहाई


होली के मौके पर यह चिट्ठी वाया ई मेल मुझे मिली। आप भी देखिए...

डाक्साब,
जै राम जी की, होली मुबारक हो

इहां कुसल सब भांति सुहाई। उहां कुसल राखै रघुराई।।
आगे राम की इच्छा। आगे समाचार यह है कि अबकी होली परदेस में ही बीत रही है। अपने अवध इस बार भी नहीं जा पा रहा हूं। अब जबकि इस होली हम आपको पत्र लिख रहे हैं, तब हमारी चिंताएं भी बदल चुकी हैं। इस बार अम्मा के हाथों सरसों का उबटन (बुकवा) नहीं लग पाया। ‘वायफी’ ने शहनाज का मसाज पैक लगा दिया इस बार। जापान त्रासदी हमारी ग्लोबल चिंता है तो अम्मा की आंख का मोतियाबिंद का आपरेशन हमारी ‘इंडीविजुअल फिकर’। अबकी हमें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि पड़ोसी गांव की होलिका हमारे गांव से ज्यादा हहाहूट है। हम तो इस बात पर अफसोस कर रहे हैं कि हमारी हाउसिंग सोसायटी की छोटी-सी होलिका कितने टन कार्बन का उत्सर्जन कर रही है। अबकी हमने अपने बाल सखाओं की भी सुधि नहीं ली। ये अलग बात है कि आधा दर्जन अखबारों के संपादकों को एसएमएस भेजे। अपनी भौजी के हाथ की बनी गुझिया हमें ‘फैटी’ लग रही है। बॉस की बीवी के फ्रिज में रक्खी फैट फ्री गुझिया हमें भा गई।
सरसों के खेतों और आम के बौर से छनकर आती हवा हमें मदहोश नहीं कर रही है। हम तो स्कॉच गटककर टल्ली हैं। न रंग का नशा, न भंग की खुमारी। बुरा न मानना, आप भी सेलिब्रेट करना।

ये न सोचना कि हम ऐसे हो गए हैं।
बस हम थोड़ा प्रोफेशनल हो गए हैं।
आपको पता ही है ये टुच्ची जरूरतों के बारे में
और हां, कोई हमारे गांव-गिराव का मिल जाए तो उसे ये चिट्ठी मत दिखाना, क्योंकि हमारी गांव में बड़ी ‘इज्जत’ है। और वैसे भी हम हैं नहीं ऐसे। मन की बात बताएं तो हमारे दिल में भी एक होलिका फुंक रही है रह-रहकर...आपकी कसम।
थोड़ा लिखा ज्यादा समझना, कलम की रोशनाई फीकी पड़ रही है।
एक बार बोलो..जोगी रा सा रा रा रा रा रा .......

आपका
पवन

Sunday, November 28, 2010

मेरे घर में कबूतर

कबूतरों के लिए कोई जगह नहीं थी उस कालोनी में। कई जगह से निराश होने के बाद कबूतरी ने पवन के घर में अपने लिए जगह तलाशी। कोई भी सुनकर हंसेगा कि मेरी इस कबूतरी को लेकर देर-देर तक बातें होती थीं। मसलन अंडे का रंग अब कैसा है, क्या आज कबूतरी आई थी, क्या तुम उसे दाने डालना तो नहीं भूल गए। एक उम्मीद जन्म ले रही थी। मैंने कहा था अंडे फूटें तो मुझे जरूर बता देना.....पिज्जू पैदा हुए तो मुझे सूचना मिली। सब खुश थे। नन्हें प्रत्यूष न जाने कितनी बार उनके घर में झांक कर चले आते कि सब कुछ ठीकठाक है या नहीं..पिज्जू ने एक दिन पंख फैलाए और उड चले। अब घर उस पिज्जू के बिना बहुत उदास है। पवन ने यह कबूतर कथा लिख भेजी है....फैजाबाद के गांव मोदहा के रहने वाले पवन तिवारी दिल्ली में खबरनवीस हैं। वह कबूतर कथा का एक टुकडा और भेजेंगे....


बस, इतना ही नाता था उस उस अंडे से? अंडे से निकला मांस का टुकड़ा अब
सुंदर सी चिड़िया के आकार में ढल चुका था। वह उड़ चली, अपने गहरे काई के
रंग जैसे डैनों के सहारे। अनंत आकाश में फड़फड़ करते। नन्हा प्रत्यूष
आसमान की ओर ताकता रहा। फिर उसने गमले के उस कोने की ओर देखा। जैसे
सूनापन उसे कचोट रहा हो। उसने जोर की आवाज लगाई एइइइइ..पिज्जू,,लो
चॉकलेट। अच्छा तुम्हें चॉकलेट नहीं पसंद तो लो चावल के दाने। पिज्जू नहीं
आया...। अनमना सा मुंह बनाकर अब वह मेरे पास सवालों के गुच्छे लेकर खड़ा
था। पापा पिज्जू फिर आएगा ना? मुझे पता है ये दिल्ली के कबूतर हैं। फिर
भी मैंने अपने पांच साल के बेटे को दिलासा दी। हां, क्यों नहीं आएगा। फिर
मैं भी धक से रह गया। अभी तीन दिन पहले ही पत्नी से मैंने कहा था, परेशान
न हो अब ये उड़ने वाली है। उन्हें बस एक दिक्कत थी, कबूतरों की बीट से।
बड़बड़ाती रहती, मैं इसे कामवाली से कहके फिंकवा दूंगी हां, मर जाएगी
महोखनी। पर मैं और प्रत्यूष उस वक्त वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट बन जाते।
पत्नी हथियार डाल देतीं। आज गमले का खाली कोना देख उनके चेहरे पर भी
अनमनस्कता साफ पढ़ी जा सकती है। मैंने नश्तर चुभोया...चलो भई अब बालकनी
साफ रहेगी। वे मौन रहीं,,फिर मैंने कुरेदा..वे कुछ न बोलीं,,मैंने अखबार
से मुंह निकाला, वे ढुलके हुए आंसू अपने आंचल से पोंछ रही थी।
पिछले दो महीने से मेरा घर मिनी जू (चिड़्याघर)बन गया था। प्रत्यूष
अपनी स्कूल वाली मैम को बता आया था। मैम मेरे घर में अंडा है। मैम बोली
थी, वो तो मेरे फ्रिज में भी रखा है। अरे...नहीं,,मैम वो नेस्ट में है।
पिजन ने दिया है। डैड बता रहे थे, इसमें से बच्चा निकलेगा? सच. फिर उसने
अपने दोस्तों को भी बताया। अगर आपने भूतनाथ फिल्म देखी हो तो जैसे मंकू
ने एंजल वाली बात पूरे स्कूल में फैलाई थी, बेटे ने भी कुछ वैसा ही
कारनामा किया था। फैजाबाद वाले घर पर बात होती तो बड़े भइया पूछते कबूतर
के बच्चे का क्या हाल है? बरेली में डॉक साहब से भी मैं हालचाल बता ही
डालता।..कितना रच बस गया था ये पिज्जू।
मुझे याद आ रही है। पिज्जू की फ्लैश बैक स्टोरी। चलते हैं अतीत की ओर।
सितंबर खत्म होने को था। पत्नी मायके गई थीं। घर में मैं अकेला। आदरणीय
काशीनाथ सिंह की शैली में कहें तो फटक...गिऱधारी,, ना लोटा ना
थारी।..गमले का खाली कोना देख कबूतर के एक जोड़े ने उसे घोसले के लिए
तजवीज लिया। काही रंग कहे या सिलेटी। पीछे पूंछ की ओर दो स्याह रंग की
धारियां। ये दोनों धारियां मुझे छुटपने से ही बेहद लुभाती थी। मैं दरवाजे
की जाली से बालकनी की ओर झांक रहा हूं। एक कबूतर आया, उसकी चोंच में
तिनका था। दूसरा आया। उसने पास पड़ी झाड़ू से तिनका अपनी चोंच में दबाया।
फिर गमले के कोने रख दिया। ये काम जल्दी-जल्दी होने लगा। वैसे जहां तक
मेरी जानकारी है, कबूतर को घोंसले बनाने के मामले में बेशऊर कहा जाता है।
घोंसले तो साहब बया बनाती है। तभी तो वीवर बडॆ बोलते हैं। कोयल के बारे
मे कहते हैं कि वो सयाने कौए को ही मामू बनाकर उसके घोसले में अंडे दे
देती है। कौएं मियां उसे सेते भी हैं। बाद में अपनी बेवकूफी पर पछताते
हैं। चलो खराब ही सही कबूतर का कम से कम अपना तो ठौर है। न धोखा, न फरेब।
कबूतरों का जोड़ा। घोसले का मुआइना करता..फिर इत्मीनान होकर एक कबूतर
दूसरे की चोंच को अपने मुंह में कसकर पकड़ लेता. उसे ऊपर नीचे करता। अब
समझ में आया..चोंच लड़ाने वाला जुमला कहां से निकला। अगली दोपहर मैं सोकर
उठा। गमले के पीछे घोंसले में एक कबूतर दम साधे बैठा है। शायद यह मादा
है। यानी बैठी है। मैंने झांका. दो अंडे दिखे। सफेद, लेकिन लालिमा लिए।
जैसे सफेद प्लास्टिक के खोल मे छोटे टिमटिमाते बल्ब लगे हों। जैसे मेरा
घर भर गया हो। मोबाइल से फौरन पत्नी को बताया। वे खुश नहीं हुईं, नाराज
भी नहीं हुई। शायद गंदगी को लेकर सशंकित रही होंगी। प्रत्यूष बेहद खुश
हुआ। फोन से रोज मुझसे अपडेट लेता। ननिहाल से लौटा तो बस दिन भर ताकझांक
करता रहा घोसले में। कभी कबूतरी उसे पंख फड़फड़ाकर डरा भी देती। वैसे
मीडिया की जुबान में कहें तो बेटे के लिए ये ब्रेकिंग न्यूज थी। उसने दिन
भर इस खबर पर खेला। पहले फ्लैश किया। फिर पूरा पैकेज चलाया। वीओ भी उसका।
स्क्रिप्ट भी उसी की। बस डायरेक्टर मैं था। बगल वाली भाभी जी ने तो
बाकायदा एक्सपर्ट कमेंट भी दिए
खबर तो अभी चलनी बाकी है। अभी इसे पूरी टीआरपी नहीं मिली। डायरेक्टर का
दिमाग बड़ा शातिर है। टारगेट आडिएंस तक खबर पहुंचा के ही दम लेता है। न
भइया जी। संपादक साहब भी तो ऐसे ही हैं। कहते हैं सेलेबल खबरें छापो बस।
मरने खपने में ज्यादा दम नहीं है। हां तो बात टारगेट आडिएंस की हो रही
थी। सामने वाले फ्लैट में कॉलसेंटर की लड़कियां रहती थीं। मैने अपने
रिपोर्टर के जरिए उन तक खबर पहुंचवा दी। काम हो गया लगता है। एक स्लीवलेस
लड़की वाइल्ड लाइफ प्रेमी निकली। घूरने की मेरे आदत से कुढ़ी रहने के बाद
भी वो बोल बैठी..वॉव..वॉव ओ माई गॉड कहां हैं एग्स। फिर मैंने कायदे से
ब्रीफ किया। कहा, घर आकर आप अंडे देख भी सकती हैं। छू भी सकती हैं। किचन
में मटर छील रही पत्नी को ये बड़ा नागवार लगा। उन्होने धीमे से उस लड़की को कोसा।
शायद आवारा कहा। वो भी कहा जो विभूति जी ने कहा था, लेखिकाओं के बारे में। मैंने भी अपने
चरित्र का दोगलापन दिखाया, खीस निपोरते हुए बोला आवारा तो हई हैं, बताओ
अंडे वाली बात बाद में तुमसे भी तो पूछ सकती थीं। हाहाहाहा...। कमाल है
भाई।
क्रमशः

Thursday, November 25, 2010

शहर में मैं

अवनीश भाई से यह कविता काफी मुश्किल से हासिल कर पाया। वह लिखते हैं लेकिन छपते नहीं हैं। कई बार मेरी जिद पर भी वह नहीं पसीजे तो मैं उनकी डायरी चुरा लाया हूं। यह कविता बानगी है। आगे भी दिया करूंगा। उनकी नदी पर लिखी कविताएं बहुत सुंदर हैं। उनके बारे में सिर्फ इतना कि बच्चों के लिए उनकी किताबें तैयार करते हैं और बेसिक शिक्षा विभाग में सर्वशिक्षा अभियान के जिला समन्वयक हैं।

एक पूरी शाम
मेरे घर में ठहरना चाहती थी
उन पंछियों की तरह
पूरी उडान की हौंस पूरी कर
जो टोह रहे होते हैं नीड
किसी भी ऋतु में

मगर मैं अपने घर में था ही कहां!

बचपन में एक बार खूब नाराज होकर
कहा था मां ने
देखना एक दिन तू मर जाएगा!

मैं नहीं जानता था तब
नहीं जानता था तब

मां को तब भी पता था

शहर में मेरे होने का मतलब
..................
डा. अवनीश यादव

Saturday, August 21, 2010

जंगली खरगोश जैसा प्यार

मैं किसे अपना हाजिर नाजिर मानूं
ईश्वर को

मैं आपको हाजिर नाजिर मानकर
कहता हूं कि
मैंने आपसे प्यार किया है
यह मेरा गुनाह है

इस वक्त नहीं है
मेरे पास कोई गवाह
मेरे पक्ष में
सभी ने सिल लिए हैं मुंह

मैं गीता की कसम खाकर
कहता हूं कि
जो कुछ कहूंगा
वह तुम्हारे प्यार की तरह
सच्चा होगा
एकदम खरा

और गवाहों की बात करूं तो
किसने देखा है
मुझे प्यार करते हुए
यानि अपराध करते हुए

इस अंधेरे समय में
कौन कहेगा कि
यह प्यार सच्चा है
इसे बखश दो मी लॉड

मेरे प्यार के पक्ष में
कोई गवाही नहीं आ रही है
जिसे बोलना था
उसे होठों पर हथकडियां हैं

खामोश अदालत जारी है

भद्रजनों
मुझे प्यार के अपराध के लिए
क्षमा करो
क्षमा करो
विप्र
मैं जोडने में गलती से
तोड बैठा हूं कुछ
जो मुझे नहीं मालूम

और न्याय की कुर्सी पर बैठे
राजा जी
हमेशा की तरह
मेरे प्यार को भी दे दो सजा-ए-मौत
लेकिन मेरा प्यार
जिंदा रहेगा
ओस की बूंदों में
जमुन जल में
शाखों में, बल्लरियों में
अमलताश में
पहाड की किसी हरियाली चोटी पर
सुबह उगेगा दूब-सा भीगा
सांझ को गायों के साथ लौट आएगा
दुबककर
धूल उडेगी
और समा जाएगा
मेरे अंतर के कोने-कोने में

प्यार
किसी जंगली खरगोश की तरह
मारेगा उछालें
नर्म-नर्म
नदी, पर्वत, खेत, खलिहान पार करता हुआ
आकर दुबक जाएगा
मेरी गोद में
गर्म-गर्म
प्यार मरेगा कहां।

- पंकज

Sunday, August 8, 2010

नदी

सुधीर विद्यार्थी की यह कविताएं कथादेश में छपी थी, अचानक नजर पडी तो इन्हें ब्लाग पर देने का मन हुआ। इन कविताओं को मरती हुई नदियों का बयान कहना ठीक होगा। अपनी राय दीजिएगा। -पंकज

जानवर ज़रूरत भर पानी
पी रहे हैं नदी से
चिड़िया चोंच भर पीती हैं
मछलियाँ और मगरमच्छ
गलफड़े भर कर
वृक्ष सोखते हैं
जड़ भर पानी
सूरज अपनी गर्मी भर पीकर
लौटा देता है बादलों को
पर मनुष्य को कितना पानी चाहिए
यह नदी भी नहीं जानती

दो

जंगल में रहकर नदी
जंगल नहीं हो जाती
जंगल के जंगलीपन के बावजूद
वह नहीं छोड़ देती
अपना नदी होना

तीन

नदी को पंडित जानते हैं
जानते हैं तिलकधारी पंडे
कथावाचक और हरबोले
तंबुओं के खूँटे गाड़ते मजदूर
प्रसाद की दुकानों पर बैठे
मैले-कुचैले हलवाई
लहरों को पतवार से चीरने वाले
मल्लाहों के काले चौड़े मज़बूत कंधे
नदी इन सबके लिए
कोई पवित्र शब्द नहीं
वह थाली में सजी
भूख भर रोटी है

चार

प्लास्टिक के टब में नदी भर कर
काग़ज़ की नाव उतार रहे हैं बच्चे
नाव, नदी और बच्चे
सभी खुश हैं
बच्चों के साथ रहकर
लौट आता है नदी का बचपन

पाँच

पाल लगी नावें
नदी की लहरों पर
हवा के रुख को देखकर
तैरती हैं
हवा बहा ले जाती है
अपने साथ नावों का काफ़िला
हवा के साथ-साथ
कभी नहीं चलती नदी

छह

कविता से गायब हो गई है नदी
छूट गई है नदी कविता से
एक संत कवि ने नदी के किनारे बैठकर
लिखी थीं कविताएँ
एक प्रयोगवादी कवि ने
नदी में खड़े होकर
पढ़ी थीं कविताएँ
फिर भी रूठ क्यों गई है नदी
कविता से

सात

नदी में दिखाई पड़ रहा है
हमारा चेहरा
नदी का बयान
हमारे समय पर
एक क्रूर टिप्पणी है

आठ

नदी आत्मकथा लिखना चाहती है
वह दर्ज़ करना चाहती है
अपने सारे सुख-दुख
जन्म से अब तक के
उल्लास, मिलन, बिछोह
विद्रोह और समर्पण
वह अपना अधूरापन
उगलना चाहती है
कहना चाहती है
कि उसका नदी होना
सबसे बड़ा अपराध है

नौ

नदी का संकट सिर्फ़ नदी का नहीं है
हमारे समय की सबसे भयानक खबर है यह
कि गाँव उजड़ रहे हैं
जंगल होते जा रहे हैं शहर
नदी को डंस रहे हैं
तरक्की के सबसे ज़हरीले साँप
नदी के खिलाफ़
हमारी पीढ़ी का
सबसे घिनौना षड़यंत्र है यह
नदी तुम बगावत क्यों नहीं करती
जीने के हक के लिए
दुनिया की सारी नदियों को एक हो जाना चाहिए