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Thursday, November 25, 2010

शहर में मैं

अवनीश भाई से यह कविता काफी मुश्किल से हासिल कर पाया। वह लिखते हैं लेकिन छपते नहीं हैं। कई बार मेरी जिद पर भी वह नहीं पसीजे तो मैं उनकी डायरी चुरा लाया हूं। यह कविता बानगी है। आगे भी दिया करूंगा। उनकी नदी पर लिखी कविताएं बहुत सुंदर हैं। उनके बारे में सिर्फ इतना कि बच्चों के लिए उनकी किताबें तैयार करते हैं और बेसिक शिक्षा विभाग में सर्वशिक्षा अभियान के जिला समन्वयक हैं।

एक पूरी शाम
मेरे घर में ठहरना चाहती थी
उन पंछियों की तरह
पूरी उडान की हौंस पूरी कर
जो टोह रहे होते हैं नीड
किसी भी ऋतु में

मगर मैं अपने घर में था ही कहां!

बचपन में एक बार खूब नाराज होकर
कहा था मां ने
देखना एक दिन तू मर जाएगा!

मैं नहीं जानता था तब
नहीं जानता था तब

मां को तब भी पता था

शहर में मेरे होने का मतलब
..................
डा. अवनीश यादव