Tuesday, August 16, 2011

...काश ये दुनिया तीन घंटे की फिल्म होती



सौ सवाल हैं। प्रकाश झा ने इनके जवाब भी दिए हैं...अपनी नई विवादित फिल्म आरक्षण के जरिए। बहस भी उनने छेड़ी है और इस बहस का सकारात्मक उपसंहार भी उन्होंने ही किया है। वैसे मेरी राय में इसे सिर्फ एक फिल्म मानें तो ये नाइंसाफी होगी। ये बहुत पुरानी बात है..कहने की जरूरत नहीं कि फिल्म औऱ साहित्य समाज का दर्पण होते हैं। पर प्रकाश झा ने अपने खास अंदाज में न सिर्फ आइना दिखाया है, बल्कि उसका समाधान भी सुझाया है। फिल्म देखने के बाद सच पूछिए तो मुझे लगा कि आरक्षण के बहाने इस फिल्म में शिक्षा के मौजूदा ढांचे पर सवाल उठाए हैं। मैं दिल्ली के एक मॉल के सिनेमा हाल में फिल्म देखने गया। कुछ सतही मानसिकता के लोगों ने कुछ एक डायलॉग पर तालियां बजाई, हल्की टिप्पणियां की। पर मेरी राय में कहीं से किसी की भावनाएं आहत करने जैसा कुछ नहीं किया गया है इस फिल्म में। बेहद संतुलन बनाया गया है। अगर पीएल पुनिया जी इस फिल्म को देख लेते तो बेहतर रहता। वैसे जैसा कुछ फिल्म में घटा है, वैसा ही इस फिल्म के साथ हुआ है। देश और समाज को कैसे गिनती के कुछ पूंजीपति, राजनेता, जातीय संगठनों के तथाकथित अगुवा कैसे खोखला कर रहे हैं। इसे देखना है तो अपने इर्द-गिर्द देखिए और न दिखे तो यह फिल्म देखिए।
फिल्म के पहले सीन में एक दलित युवक दीपक कुमार का इंटरव्यू चल रहा होता है। बोर्ड के लोग पहले उससे उसका सरनेम जानने की कोशिश करते हैं फिर उसका बैकग्राउंड। बाद में वे कहते हैं कि जिस संस्थान के लिए वह इंटरव्यू देने आया है उसमें तो अभिजात्य वर्ग (एलीट क्लास) के स्टूडेंट्स पढ़ते हैं और उन्हें न केवल मैनर्स सिखाए जाते हैं बल्कि बॉडी लैंग्वैंज तक के बारे में बताया जाता है। इस पर कैंडीडेट का जो जवाब होता है वह आप खुद सिनेमा में सुनें तो बेहतर होगा। वही कैंडीडेट (सैफ)जब एक सवर्ण दोस्त के तानों के जवाब में कहता है कि ठीक है रेस शुरू हो पर इसकी स्टार्टिंग लाइन भी एक हो। आप की मां एसी कमरे से निकलकर मेरी मां की तरह लोगों के घरों में काम करे। आप की बहन मेरी बहन की तरह बस्ती के एक मात्र नल से एक घंटे लाइन में लगकर एक घड़ा पानी भरकर लाए।....
इस देश में दो भारत बसते हैं....
ये तो नहाते भी नहीं...
इस तबेला कोचिंग को खत्म करना है..
मैं मां हूं भारत माता नहीं,,,,
सरीखे डायलॉग मन को छूते हैं। महानायक महानायक हैं। अभिनय के शलाका पुरुष। मनोज वाजपेयी महान कलाकार हैं। सैफ ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है तो दीपिका ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इस फिल्म में एजुकेशन के व्यावसायीकरण पर जबरदस्त चोट है। उसका समाधान भी है। मेहनत ही सफलता की कुंजी है ये संदेश भी है।
फिल्म का सुखांत होता है.. पर काश जिंदगी और ये दुनिया तीन घंटे की फिल्म होती तो सारी समस्या बस एक थिएटर में खत्म होती। पर सोचना होगा। देखना होगा। समझना होगा। सतर्क रहना होगा। आखिरकार जिंदगी एक अभिनय ही तो है। है ना...आप बताओ...
महानायक को कोटि कोटि नमन। मनोज वाजपेयी ने निगेटिव रोल में फिर बता दिया कि वे मनोज वाजपेयी हैं। दीपिका इतनी गंभीर कभी नहीं दिखी। ओंकारा वाले सैफ,,,गजब। अंत में प्रकाश झा को साधुवाद.. जिन्होंने बेहतर समाधान सुझाया है।

Saturday, June 11, 2011


बसंत से एक दिन पहले सुरमई सांझ के वक्त लिखी गई यह पंक्तियां एक कोमल ह्दय की भावनाएं हैं। बहुत समय बाद चिट्ठियां याद आईं। इन्हें सहेजना जरूरी लग रहा है, इसलिए ब्लाग पर दे रहा हूं.।

यह महज एक फूल नहीं है....
पिहू,
आज एक फूल भेज रहा हूं। यूं तो आपको तमाम फूल मिलते होंगे मगर यह फूल उन फूलों से काफी अलग है। आप पूछेंगी अलग क्यों। आखिर सवाल पूछना तो आपकी फितरत रही है और तुरंत ही उसका जवाब देना हमारी आदत। तो जनाब यह फूल अलग है इस लिए क्यों कि यह मेरे प्यार से पगा हुआ है। यह कोई बजारू फूल नहीं है जो दस रुपये के मुड़े-तुड़े नोट के बदले किसी दुकानदार से खरीदा गया हो। यह नितांत निजी फूल है। मेरा अपना फूल। छह महीने पहले मैंने तुम्हें पहली बार देखा था। बाजार जा रही थी तुम। रिक्शे पर बैठी। हाथ से दुपट्टे को संभालते हुए। सामान से भरे थैले को पकड़े हुए। मैं तो थम सा गया था उस एक ही पल में। पता न था कि यह पल कभी इस तरह से लौट कर आने वाला है पर वो आया। वह भी अपने सुनहरे रुप में। नई जगह र्कोंचग पढ़ने पहुंचा तो तुम भी नजर आईं। मुझे खुद अपनी किस्मत से रश्क हो रहा था। मेरी किस्मत इतनी अच्छी है इसका तो कभी अहसास ही न था। तुम मिलीं, बातें हुईं, मुलाकातें बढ़ीं और मैं तुम्हारा होता चला गया। कई बार लगा कि शायद तुम भी मेरी हो रही हो। लगा कि शायद मैं और तुम ‘हम’ हो रहे हैं, पर कभी पूछ नहीं पाया। तुम्हे फूलों का शौक था। सोचा कि एक फूल मैं भी तुम्हें दूं पर दिया नहीं। हां एक पौधा लाकर जरुर अपने छोटे से घर के नन्हें से आंगन में लगा लिया। गुलाब का पौधा। पहली बार लगाया था कोई पौधा। स्कूल से लेकर कालेज तक वृक्षारोपड़ पर खूब भाषण दिए। निबंध भी लिखे पर पौधा लगाया कभी नहीं। इस बार लगाया। पहली बार। तुम्हारे लिए। अल सुबह उठते ही उसमें पानी डालता। थोड़ी सी खाद भी लेकर आया था। घर से निकलते और घुसते हर बार मैं उसे जरूर देखता। आखिर एक दिन उस पर फूल खिल ही गया। लाल गुलाब। सुर्ख लाल बिल्कुल उसी दुपट्टे के रंग का जो तुम उस दिन रिक्शे पर ओढ़कर निकली थीं। हमारी पहली मुलाकात का रंग। यह वही फूल है पिहू। मेरा फूल जो इस धरती पर केवल इस लिए आया कि मैं तुम्हें उसे देकर कह सकूं कि यह महज एक फूल नहीं है.।
आशीष दीक्षित

मैं जानता हूं यह विस्थापन नहीं
कम से कम यह विस्थापन तो नहीं ही है, पर दर्द इसका भी किसी विस्थापन से कम नहीं है। आप एक गंवई जगह में लगातार बिना किसी रोक-टोक के बिना किसी अनमनेपन के 23-24 साल रहते हैं और एक दिन आपको वहां से नई जगह के लिए चलना पड़ता है। नई जगह बहुत अच्छी है, बहुत ही अच्छी। यहां मन लगते किसी की भी देर नहीं लगती। मन लग जाता है पर फिर भी एक शून्य तो है ही। यहां आने के बाद हम तमाम नए दोस्त बनाते हैं पर वे दोस्त कहां जिनके साथ लकड़ी की काठी से लेकर साइकिल की कैंची तक और फिर दो पहिया फर्राटा से लेकर एशिया के सबसे बड़े उपक्रम भारतीय रेल पर सफर किया था। जिनके घर घुसकर हम हल्ला मचाते थे। कई बार आस-पास खेलते हुए हम उनके घर के बिल्कुल अंदर की तरफ बनी कोठरी में घुस जाते थे। हैं कोई जो हमें ढूंढ़ पाए। नहीं हैं न वे दोस्त पर यह जगह अच्छी है। बहुत अच्छी है यह जगह। यहां एक से बढ़कर एक पार्क हैं। पार्क में तमाम पेड़ हैं। झूलों की तो भरमार है। बस वो पाकड़ यहां नहीं दिखी जिस पर हमने हर बार तीज पर झूला डाला था। उस झूले पर खुद तो कभी नहीं झूले पर हमारी बहिनें और हमारे दोस्तों की बहिनें तो खूब झूलीं। वो वाला आम का पेड़ भी नहीं मिला जिसका एक भी आम ऐसा नहीं था जो हमारी लग्गी की जद में न आता। मिला तो वो अमरुद भी नहीं जिस पर कभी अमरूद पक ही नहीं पाए। हमने लगते ही उन्हें तोड़ने की आदत तो जो डाल ली थी। खैर कुछ भी हो यह जगह है तो बहुत ही अच्छी। कहीं भी जाना है सवारी हाजिर। आराम से बैठकर चले जाओ। पर हमें यह आराम भाता ही कहां। हमें तो विक्रम पर लटककर जाने में ही मजा आता है। विक्रम के गेट पर क्लीनर के साथ मैं लटक जाता था तो पीछे मेरे तीन दोस्त। हाईस्कूल के पेपर हमने ऐसे ही लटक-लटक कर दिए थे। तब हम शायद जवान हो रहे थे और हमारा डर खत्म हो रहा था कि लटककर गिरने का खतरा भी रहता है। हम ऐसी बस में बैठना पसंद करते थे जिसमें 62 सवारियां बैठी और लगभग 30 खड़ी और 12-14 गेट से लेकर दांये-बांये तक लटकी रहती थीं।
अब क्या किया जाए नई जगह पर आ गए तो मन तो लगाना ही था। जिंदगी की गाड़ी तो चलानी ही थी। खुद भले ही अंदर ही अंदर घुलते रहो पर दूसरों को तो खुश रखना ही था। मैं भी दूसरों को खुश करता चला गया। नई जगह पर एक सुंदर सी कालोनी, सुंदर सी कालोनी में एक अच्छा सा घर और मजेदार पड़ोसियों के बीच दिल लग ही गया। पर कितने दिन।
इस दीवाली किसी ने बड़ा वाला बम फोड़ा होगा तो किसी ने सीटी वाले सतरंगी राकेट। कुछेक ने गोलमाल थ्री देखी होगी तो किसी ने एक्शन रिप्ले। कुछ लोगों ने ताश के पत्ते भी फेंटे होंगे। बस हम ही सबसे अलग थे। हम नई जगह जा रहे थे। यह वैसे खुशी की बात थी। हमने अपना घर खरीद लिया था। पूजा तो काफी दिन पहले ही हो चुकी थी पर हम लोगों ने अपनी आमद दीवाली पर ही वहां दर्ज कराई। अब एक और नई जगह। दीवाली की रात जब तक आफिस के कुछ साथी साथ रहे या हम अपने कुछ साथियों के साथ रहे तब तक ही सब कुछ ठीक था। उसके बाद तो मानो वीराना सा छा गया। ऐसा नहीं कि घर पर कोई है नहीं। ऐसा भी नहीं कि आसपास घर न हों। ऐसा भी नहीं कि कोई और बम-पटाके न छोड़ रहा हो। सब एकदम मस्त थे। खुश। पर यह खुशियां मेरे पास तक नहीं आ पा रही थी। तो क्या मैं एक और विस्थापन झेल रहा था। कभी हरसूद तो कभी टिहरी के लोगों का विस्थापन अखबारों में सुर्खियां बनते देखा था। कई बार उस दर्द के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश की पर जुड़ नहीं पाया। बस यही लगता था कि क्या दिक्कत है इन लोगों को जो रोना-पीटना मचा रखा है। जबकि सरकार एक जगह के बदले दूसरी जगह दे रही है। अब महसूस हुआ वह दर्द बहुत गहरे से। अंदर तक भेद सा रहा है। काट रहा है। कचोट रहा। आत्म ग्लानि सी महसूस हो रही है। गहरा दर्द। यह जानते हुए भी कि यह कोई विस्थापन नहीं है।

आशीष दीक्षित

Friday, June 10, 2011

तलाश


जिंदगी छोटे-छोटे टुकड़ों से बुनी है। बड़े-बड़े कथानक कहां से तलाश करूं।
ये मेरी तलाश है उपेक्षित टुकड़ों को एक जगह इकट्ठा करने की। इन्हें आप
चाहें कहानी कहिए, कविता कहिए जो चाहें कहिए...आपके ऊपर छोड़ा है। ये
टुकड़े उठाने-जुटाने में मेरे साथ दोस्त पवन तिवारी और आशीष दीक्षित भी
रहेंगे।

कोने वाली उदास बेंच

अच्छा है/सच्चा है/बच्चा है - प्रेमरंजन अनिमेष

पहला दिन

सामने पार्क है जो घर के छज्जे से दिखता है। दिन भर सूने दिखने वाले
पार्क में शाम के वक्त वहां कुछ बच्चे नुमाया हुए हैं। कुछ के साथ उनकी
मम्मियां भी आई हैं। रंग बिरंगे कपड़ों में बच्चे। मेरे लिए यह बेमकसद
किसी ऐसी दुनिया को देखना है, जहां से कुछ हासिल नहीं होगा। उनको
उछलता-कूदता देख रहा हूं। बच्चों को इस तरह खेलते हुए बहुत समय बाद देख
रहा हूं। भूल गया हूं कि बच्चे खेलते भी हैं। सिर भारी है। इस भारीपन को उन बच्चों की चहचहाहट पिघला रही है। मैं उनके
और करीब गया हूं।

कोने की बेंच पर बैठे दो बच्चे एक दूसरे की आंखों में ताक रहे हैं।
नेहा कह रही है, ‘ये तितलियां इतनी जल्दी मर क्यों जाती हैं सूरज’
‘तितलियां खूबसूरत होती हैं, इसलिए मर जाती हैं’
‘मुझे भी एक तितली लाकर दो ना’
हाल की में हुई बारिश से पेड़ नहाए हुए हैं। बेलों का एक झुरमुट हैं। उस
झुरमुट पर कुछ तितलियां पानी की बूदों को छू रही हैं। सूरज उन में घुसकर
तितलियों को पकड़ने की कोशिश में है।

‘तुम भीग जाओगे सूरज’
‘मुझे भीगने दो नेहा, मैं भीगना चाहता हूं’
‘अब तुम्हे तितली नहीं मिलेगी’
‘तुम भी तो तितली जैसी हो’
‘क्या कहा....हट्ट’
‘मैं तुम्हे प्यार करता हूं.....।’
आवाज कुछ तेज थी। मम्मियों के कान खड़े हो गए।

दूसरा दिन

बच्चे खेल रहे हैं। कोने वाली बेंच आज उदास है। मैं दोनों बच्चों को तलाश रहा हूं।
बेंच के नीचे सफेद बुर्राक पंखों पर गुलाबी छीटों वाली तितली मर चुकी है।
मम्मियां जोर-जोर से हंस रही हैं।
प्यारे बच्चो, मैं तुम्हे नहीं जानता हूं फिर भी तुम्हे बहुत याद कर रहा हूं।
मैं उदास हूं।

मैं तुम्हे कहां तलाश करूं...नेहा।

पंकज मिश्र

अब मैं एक स्त्री हूं
वो पूनम का चांद नहीं था? जिससे चांद को तराशा गया है वह एक अनगढ़ सी
सुनहली मिट्टी का टुकड़ा भर था। अभी इसका कोई आकार नहीं था। फिर भी कशिश
इतनी कि जी करता था निहारता रहूं बस। एकटक, पलकें झपकाए बिना। चांदनी में
घुला हल्का अंधेरा हो, बस इतनी ही उजास हो उसमें कि मुखड़ा तुम्हारा
दिखता रहे। तुम मुझे न देख पाओ। मैं नहीं चाहता तुम मुझे देख सको। तुम बस
आसमान की ओर ताकती रहो..देखो किस तारे पर तुम्हारा नाम लिखा है? मगर तुम
ये नीचे की रेतीली धरती पर क्या तलाशती फिर रही हो? समझ नहीं आ रहा।...
मुझे ले चलो...। कांपते होठों से उसकी लरजती हुई आवाज निकली। अंधेरे पाख
में अभी पूरे पंद्रह रोज बाकी हैं, तुम ले चलो बस। जल्दी करो..। अभी
बादलों की ओट है। अभी मेरा अभ्युदय बाकी है। पूरणमासी आते-आते मैं जब
पूरा चांद हो जाऊंगी तब मेरी डोली उठेगी और तब तुम मुझे देख नहीं पाओगे।
ओझल हो जाऊंगी मैं तुम्हारी आंखों के आगे से। तब तुम अभिनय करोगे खुश
होने का। तुम रो नहीं सकते खुलकर,,,। तुम मुझे रोक भी न सकोगे। .क्यों?
क्योंकि तुम मेरे पिता नहीं हो। भाई होते तब भी विदा की घड़ी में तुम
आखिरी बार मेरी पलकों के नीचे अपनी अंगुलियां फिराकर मेरे आंसू सुखा सकते
थे।
तो तुम चलो, एक छोटी पगडंडी पकड़ते हैं। बस, इसे पकड़कर सीधी चलती रहना,
देखना पैर डगमग न हों, अगल-बगल गहरी खाईं है। गहरी खाई है??? तो क्या तुम
मुझे गिरने दोगे? तुम भी न बावरी हो। मैं खुद को संभालूंगा कि तुम्हें।
अब छोड़ो भी बस ले चलो। उसने जिद नहीं छोड़ी। चलती चली गई...उसके पैर के
तलुवे जमीन पर पूरे चिपक रहे थे। उसके एक कदम पड़ते तो फिर वह बादलों की
ओर देखती..लंबी सांस छोड़ती..। उसने मेरा कंधा पकड़कर झकझोरा।
सुनो...सूरज को रोक दो..। कह दो इतना उतावला न बने। क्यूं अब सूरज से
तुम्हारी क्या रुसवाई? है रुसवाई। ये आएगा तो अंधेरा छंट जाएगा और जब
अंधेरा छंट जाएगा तो तुम मुझे देख नहीं पाओगे। फिर मैं अपने देस चली
जाऊंगी। फिर तुम मुझे कहां ढूंढते भटकोगे? व्यर्थ होगा, तुम मुझसे फिर
कभी नहीं मिल सकोगे। फिर उसने मेरे कंधे पर अपना सिऱ टिकाया। आंखे
मूंदी., आंखों से खारे पानी की धारा बहाती सपनों में खो गई।
सुनो कोई गीत गुनगुनाओ...। कोई भ्रमर गीत। फिर वह गीत सुनती रही। ये गीत
मन मंदिर में गूंजते रहेंगे। तब लगेगा कोई दूर रहकर भी कितना करीब है।
अब घने बादल साथ छोड़ रहे हैं। रुई के फाहे की मानिंद,,अब तुम्हारा चेहरा
कुछ-कुछ दिखने लगा है। जब ये सबको दिखने लगेगा तब ये मुझे नहीं दिखेगा।
उसने आंखें भींचते हुए बादलों की ओर देखा। तुमने सूरज को रोका क्यों
नहीं। अब जब मेरा चेहरा सबको दिखेगा तो मुझे जाना ही होगा। तुम आना.. जब
शहनाई के शोरगुल के बीच लोग मेरा पीहर छु़ड़ा देंगे। तब मैं स्त्री जैसी
दिखूंगी। जिसकी कोख से मैं जन्मी, शगुन की दही-चीनी खिलाकर वह मुझे जाने
किसे सौंप देगी। मैं जानती हूं वह मेरी मां है, पर वह भी एक स्त्री है।
उसका कलेजा छलनी हो रहा होगा पर वो गीत गाएगी और आंचल में मुंह छिपाकर
रोएगी। बाबा...जिनने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उनके सिऱ का बोझ उतर गया।
कागज के कई बंडल जिन पर मुद्रा होने की पहचान छपी थी। बाबा ने उन अनजाने
लोगों को सौंप दिया था और कहा था बेटी बड़े दुलार से पली है..ये कुछ पैसे
हैं..बेटी के जन्मने का जुर्माना। कोई गलती हो गई होगी खातिरदारी में तो
माफी।

अब शहनाई का शोरगुल तारी था। ये क्या हो रहा है? ये कैसी महफिल सजी है?
लोग-बाग दावतों में मसरूफ हैं। कोई कुछ सुन क्यूं नहीं रहा। कहां है मेरी
नन्हीं परी? वो है... ना..ना नहीं। वो नहीं है। चलो अभी खुद देखेगी तो
भागती आएगी। अरे वो कौन है जिसे परंपराओं के बंधन में राजी खुशी बांधा जा
रहा है? यही है पूनम का चांद। उफ, ये किसने अजीब से रंग इस चांद के
मुखड़े पर फैला दिए हैं। कहां है वह धुला-धुला दमकता मुखड़ा। मैं गौर से
देखता रहा। कुछ रेखाएं उभर आई थीं. उस पूनम के चांद के ऊपर। ये रेखाएं
मेरी जानी हुई थीं। अक्स कुछ-कुछ धुंधलाया सा नजर आ रहा था। मैंने आवाज
दी। आवाज जाने कहां लोप हो गई? अब तुम नजरें क्यों नहीं उठा रही हो?
अंधेरा छंट गया। तुम्हारी लरजती आवाज कानों में गूंज रही है...सूरज को
रोको नहीं तो तुम मुझे नहीं देख पाओगे। उन लोगों को भी नहीं जो मुझे ले
जाएंगे। फिर तुम रो भी नहीं सकोगे खुलकर..क्यूं..क्योंकि न तुम मेरे पिता
हो न भाई। बहन और मां भी नहीं। तुम मेरे लिए पवित्र हो, पर दुनिया तुम्हे
अछूत और अपवित्र मानेगी। अब मैं एक स्त्री हूं और किसी स्त्री को छूना
पाप है।
पवन तिवारी

Saturday, March 19, 2011

हंसो मत बावरी, लोग सुन लेंगे


तुमने मुझे अपने रंग में रंगा, शुक्रिया। मेरे लिए होली के मायने रंगना है। कपड़ों से नहीं, मन से। मन न रंगाय, रंगाय जोगी कपड़ा। अब जो रंग चढ़ गया है, उसके ऊपर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ेगा।

रंगों के इस मौसम में तुम बहुत याद आती हो। याद होगा पिछली बार भी मैंने तुम्हे एक चिट्ठी लिखी थी। उसमें पलाश के फूलों का जिक्र था। उसमें तुम्हारे बावरेपन का जिक्र था। वह अमलताश भी था, जिसके सहारे मैं तुम्हे छू सका था। गेहूं के खेत सोने से दमकने लगे थे। उनके बीच एक पलाश खड़ा चहक रहा था। मैंने जाकर उसे हौले से छुआ था। मैंने कुछ फूल मांगे थे उस पेड़ से तुम्हारे लिए। और लेकर आया भी लेकिन दे न सका।

तभी से रोज मेरे सपनों में पलाश आता है। तुम खिलखिलाती हो। उस पेड़ के नीचे मैं तुम्हारे लिए फूल इकट्ठे कर रहा हूं। मैं तुम्हे रोकता हूं..न प्रिया, न, मैंने तुम्हारी हंसी को फूलों के रंगों में डुबोकर छिपाकर रखा है। तुम हंसती हो तो ये दुनियादारी जाग जाती है। हंसो मत बावरी, लोग सुन लेंगे। प्रेम छिपाना भी तो है। मैं चाहता हूं कि मैं तुम्हे मौन रहकर प्यार करूं।

बावरी, रेत था मैं। तुम खिलखिलाई एक दिन। तुम्हारे तलवों की गुदगुदाहट मैंने महसूस की। उस दिन मैंने अपनी यादों का उदास बक्सा खोला और उसमें लत्ते बन चुके कुछ टुकड़ों को सुई धागे से सिया। ये मेरे प्यार का बिछौना था। मुझ पर चलते हुए पैर जलने लगते थे तुम्हारे। मैंने तुमसे कहा था, ये राह कठिन है। खुसरो भी कह गए हैं। तुमने कह दिया था- मुझे डूबना है इसी दरिया में और पार उतरना है। पगली, हम पार कहां उतरे हैं और डूबते जा रहे हैं...और।


बावरी

पलाश यूं ही फूलेंगे
चिड़िया यूं ही चहचहाएंगी

जब भी ऋतु राग फूटेगा
तो जिद करोगी तुम कि
मुझे तुम्हारे साथ झूला झूलना है
मुझे आम केपत्ते की फिरकी बनाकर दो

फिर करोगी जिद कि
फूल से अलग कर देना कांटे
मुझे सोना है तुम्हारे साथ

कैसी बावरी लड़की हो तुम कि
हंसोगी तो खूब हंसोगी
मैं सहम जाऊंगा
लोग पूछेंगे तुमसे हंसने की वजह
फिर तुम उदास हो जाओगी
मैं ले आऊंगा तुम्हारे लिए
कुछ रंग चटख
कुछ सपने बंजारे
एक खुशबू नर्म चिड़िया के बच्चे जैसी

मैं चाहता हूं प्रिया कि
तुम प्यार छिपाना भी सीखो
खुशियां छिपाना भी सीखो
और हंसो तो सिर्फ मेरे सीने में...।

रंग और प्रेम

आज रंग है
तुम फिर पूछोगी मुझसे
कि क्या होता है प्रेम
अब मैं क्या बताऊं


उस रंग का नाम

लाल, नीले, पीले
जाने कितने रंगों का जिक्र छिड़ा
लेकिन इनमें वह रंग नहीं मिला
जिसमें मैं रंगा

तुम्हे मालूम हैं क्या
उस रंग का नाम

रोहित की तस्वीरें






फोटो जर्नलिस्ट रोहित उमराव ने यह तस्वीरें अपने अखबारी समय से कुछ वक्त चुराकर हमें भेजी हैं। सौंदर्य के पारखी उमराव के पास चीजों को देखने समझने का दुस्साहसी नजरिया भी है। रोहित की तस्वीरों के मार्फत होली की शुभकामनाएं

फागुन की शाम


धर्मवीर भारती

घाट के रस्ते
उस बँसवट से
इक पीली-सी चिड़िया
उसका कुछ अच्छा-सा नाम है !
मुझे पुकारे !
ताना मारे,
भर आएँ, आँखड़ियाँ !
उन्मन, ये फागुन की शाम है !
घाट की सीढ़ी तोड़-तोड़ कर बन-तुलसा उग आयीं
झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं
तोतापंखी किरनों में हिलती बाँसों की टहनी
यहीं बैठ कहती थी तुमसे सब कहनी-अनकहनी


आज खा गया बछड़ा माँ की रामायन की पोथी !
अच्छा अब जाने दो मुझको घर में कितना काम है !


इस सीढ़ी पर, यहीं जहाँ पर लगी हुई है काई
फिसल पड़ी थी मैं, फिर बाँहों में कितना शरमायी !
यहीं न तुमने उस दिन तोड़ दिया था मेरा कंगन !
यहाँ न आऊँगी अब, जाने क्या करने लगता मन !


लेकिन तब तो कभी न हममें तुममें पल-भर बनती !
तुम कहते थे जिसे छाँह है, मैं कहती थी घाम है !
अब तो नींद निगोड़ी सपनों-सपनों भटकी डोले
कभी-कभी तो बड़े सकारे कोयल ऐसे बोले
ज्यों सोते में किसी विषैली नागिन ने हो काटा
मेरे सँग-सँग अकसर चौंक-चौंक उठता सन्नाटा


पर फिर भी कुछ कभी न जाहिर करती हूँ इस डर से
कहीं न कोई कह दे कुछ, ये ऋतु इतनी बदनाम है !


ये फागुन की शाम है !

इहां कुसल सब भांति सुहाई


होली के मौके पर यह चिट्ठी वाया ई मेल मुझे मिली। आप भी देखिए...

डाक्साब,
जै राम जी की, होली मुबारक हो

इहां कुसल सब भांति सुहाई। उहां कुसल राखै रघुराई।।
आगे राम की इच्छा। आगे समाचार यह है कि अबकी होली परदेस में ही बीत रही है। अपने अवध इस बार भी नहीं जा पा रहा हूं। अब जबकि इस होली हम आपको पत्र लिख रहे हैं, तब हमारी चिंताएं भी बदल चुकी हैं। इस बार अम्मा के हाथों सरसों का उबटन (बुकवा) नहीं लग पाया। ‘वायफी’ ने शहनाज का मसाज पैक लगा दिया इस बार। जापान त्रासदी हमारी ग्लोबल चिंता है तो अम्मा की आंख का मोतियाबिंद का आपरेशन हमारी ‘इंडीविजुअल फिकर’। अबकी हमें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि पड़ोसी गांव की होलिका हमारे गांव से ज्यादा हहाहूट है। हम तो इस बात पर अफसोस कर रहे हैं कि हमारी हाउसिंग सोसायटी की छोटी-सी होलिका कितने टन कार्बन का उत्सर्जन कर रही है। अबकी हमने अपने बाल सखाओं की भी सुधि नहीं ली। ये अलग बात है कि आधा दर्जन अखबारों के संपादकों को एसएमएस भेजे। अपनी भौजी के हाथ की बनी गुझिया हमें ‘फैटी’ लग रही है। बॉस की बीवी के फ्रिज में रक्खी फैट फ्री गुझिया हमें भा गई।
सरसों के खेतों और आम के बौर से छनकर आती हवा हमें मदहोश नहीं कर रही है। हम तो स्कॉच गटककर टल्ली हैं। न रंग का नशा, न भंग की खुमारी। बुरा न मानना, आप भी सेलिब्रेट करना।

ये न सोचना कि हम ऐसे हो गए हैं।
बस हम थोड़ा प्रोफेशनल हो गए हैं।
आपको पता ही है ये टुच्ची जरूरतों के बारे में
और हां, कोई हमारे गांव-गिराव का मिल जाए तो उसे ये चिट्ठी मत दिखाना, क्योंकि हमारी गांव में बड़ी ‘इज्जत’ है। और वैसे भी हम हैं नहीं ऐसे। मन की बात बताएं तो हमारे दिल में भी एक होलिका फुंक रही है रह-रहकर...आपकी कसम।
थोड़ा लिखा ज्यादा समझना, कलम की रोशनाई फीकी पड़ रही है।
एक बार बोलो..जोगी रा सा रा रा रा रा रा .......

आपका
पवन

Sunday, November 28, 2010

मेरे घर में कबूतर

कबूतरों के लिए कोई जगह नहीं थी उस कालोनी में। कई जगह से निराश होने के बाद कबूतरी ने पवन के घर में अपने लिए जगह तलाशी। कोई भी सुनकर हंसेगा कि मेरी इस कबूतरी को लेकर देर-देर तक बातें होती थीं। मसलन अंडे का रंग अब कैसा है, क्या आज कबूतरी आई थी, क्या तुम उसे दाने डालना तो नहीं भूल गए। एक उम्मीद जन्म ले रही थी। मैंने कहा था अंडे फूटें तो मुझे जरूर बता देना.....पिज्जू पैदा हुए तो मुझे सूचना मिली। सब खुश थे। नन्हें प्रत्यूष न जाने कितनी बार उनके घर में झांक कर चले आते कि सब कुछ ठीकठाक है या नहीं..पिज्जू ने एक दिन पंख फैलाए और उड चले। अब घर उस पिज्जू के बिना बहुत उदास है। पवन ने यह कबूतर कथा लिख भेजी है....फैजाबाद के गांव मोदहा के रहने वाले पवन तिवारी दिल्ली में खबरनवीस हैं। वह कबूतर कथा का एक टुकडा और भेजेंगे....


बस, इतना ही नाता था उस उस अंडे से? अंडे से निकला मांस का टुकड़ा अब
सुंदर सी चिड़िया के आकार में ढल चुका था। वह उड़ चली, अपने गहरे काई के
रंग जैसे डैनों के सहारे। अनंत आकाश में फड़फड़ करते। नन्हा प्रत्यूष
आसमान की ओर ताकता रहा। फिर उसने गमले के उस कोने की ओर देखा। जैसे
सूनापन उसे कचोट रहा हो। उसने जोर की आवाज लगाई एइइइइ..पिज्जू,,लो
चॉकलेट। अच्छा तुम्हें चॉकलेट नहीं पसंद तो लो चावल के दाने। पिज्जू नहीं
आया...। अनमना सा मुंह बनाकर अब वह मेरे पास सवालों के गुच्छे लेकर खड़ा
था। पापा पिज्जू फिर आएगा ना? मुझे पता है ये दिल्ली के कबूतर हैं। फिर
भी मैंने अपने पांच साल के बेटे को दिलासा दी। हां, क्यों नहीं आएगा। फिर
मैं भी धक से रह गया। अभी तीन दिन पहले ही पत्नी से मैंने कहा था, परेशान
न हो अब ये उड़ने वाली है। उन्हें बस एक दिक्कत थी, कबूतरों की बीट से।
बड़बड़ाती रहती, मैं इसे कामवाली से कहके फिंकवा दूंगी हां, मर जाएगी
महोखनी। पर मैं और प्रत्यूष उस वक्त वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट बन जाते।
पत्नी हथियार डाल देतीं। आज गमले का खाली कोना देख उनके चेहरे पर भी
अनमनस्कता साफ पढ़ी जा सकती है। मैंने नश्तर चुभोया...चलो भई अब बालकनी
साफ रहेगी। वे मौन रहीं,,फिर मैंने कुरेदा..वे कुछ न बोलीं,,मैंने अखबार
से मुंह निकाला, वे ढुलके हुए आंसू अपने आंचल से पोंछ रही थी।
पिछले दो महीने से मेरा घर मिनी जू (चिड़्याघर)बन गया था। प्रत्यूष
अपनी स्कूल वाली मैम को बता आया था। मैम मेरे घर में अंडा है। मैम बोली
थी, वो तो मेरे फ्रिज में भी रखा है। अरे...नहीं,,मैम वो नेस्ट में है।
पिजन ने दिया है। डैड बता रहे थे, इसमें से बच्चा निकलेगा? सच. फिर उसने
अपने दोस्तों को भी बताया। अगर आपने भूतनाथ फिल्म देखी हो तो जैसे मंकू
ने एंजल वाली बात पूरे स्कूल में फैलाई थी, बेटे ने भी कुछ वैसा ही
कारनामा किया था। फैजाबाद वाले घर पर बात होती तो बड़े भइया पूछते कबूतर
के बच्चे का क्या हाल है? बरेली में डॉक साहब से भी मैं हालचाल बता ही
डालता।..कितना रच बस गया था ये पिज्जू।
मुझे याद आ रही है। पिज्जू की फ्लैश बैक स्टोरी। चलते हैं अतीत की ओर।
सितंबर खत्म होने को था। पत्नी मायके गई थीं। घर में मैं अकेला। आदरणीय
काशीनाथ सिंह की शैली में कहें तो फटक...गिऱधारी,, ना लोटा ना
थारी।..गमले का खाली कोना देख कबूतर के एक जोड़े ने उसे घोसले के लिए
तजवीज लिया। काही रंग कहे या सिलेटी। पीछे पूंछ की ओर दो स्याह रंग की
धारियां। ये दोनों धारियां मुझे छुटपने से ही बेहद लुभाती थी। मैं दरवाजे
की जाली से बालकनी की ओर झांक रहा हूं। एक कबूतर आया, उसकी चोंच में
तिनका था। दूसरा आया। उसने पास पड़ी झाड़ू से तिनका अपनी चोंच में दबाया।
फिर गमले के कोने रख दिया। ये काम जल्दी-जल्दी होने लगा। वैसे जहां तक
मेरी जानकारी है, कबूतर को घोंसले बनाने के मामले में बेशऊर कहा जाता है।
घोंसले तो साहब बया बनाती है। तभी तो वीवर बडॆ बोलते हैं। कोयल के बारे
मे कहते हैं कि वो सयाने कौए को ही मामू बनाकर उसके घोसले में अंडे दे
देती है। कौएं मियां उसे सेते भी हैं। बाद में अपनी बेवकूफी पर पछताते
हैं। चलो खराब ही सही कबूतर का कम से कम अपना तो ठौर है। न धोखा, न फरेब।
कबूतरों का जोड़ा। घोसले का मुआइना करता..फिर इत्मीनान होकर एक कबूतर
दूसरे की चोंच को अपने मुंह में कसकर पकड़ लेता. उसे ऊपर नीचे करता। अब
समझ में आया..चोंच लड़ाने वाला जुमला कहां से निकला। अगली दोपहर मैं सोकर
उठा। गमले के पीछे घोंसले में एक कबूतर दम साधे बैठा है। शायद यह मादा
है। यानी बैठी है। मैंने झांका. दो अंडे दिखे। सफेद, लेकिन लालिमा लिए।
जैसे सफेद प्लास्टिक के खोल मे छोटे टिमटिमाते बल्ब लगे हों। जैसे मेरा
घर भर गया हो। मोबाइल से फौरन पत्नी को बताया। वे खुश नहीं हुईं, नाराज
भी नहीं हुई। शायद गंदगी को लेकर सशंकित रही होंगी। प्रत्यूष बेहद खुश
हुआ। फोन से रोज मुझसे अपडेट लेता। ननिहाल से लौटा तो बस दिन भर ताकझांक
करता रहा घोसले में। कभी कबूतरी उसे पंख फड़फड़ाकर डरा भी देती। वैसे
मीडिया की जुबान में कहें तो बेटे के लिए ये ब्रेकिंग न्यूज थी। उसने दिन
भर इस खबर पर खेला। पहले फ्लैश किया। फिर पूरा पैकेज चलाया। वीओ भी उसका।
स्क्रिप्ट भी उसी की। बस डायरेक्टर मैं था। बगल वाली भाभी जी ने तो
बाकायदा एक्सपर्ट कमेंट भी दिए
खबर तो अभी चलनी बाकी है। अभी इसे पूरी टीआरपी नहीं मिली। डायरेक्टर का
दिमाग बड़ा शातिर है। टारगेट आडिएंस तक खबर पहुंचा के ही दम लेता है। न
भइया जी। संपादक साहब भी तो ऐसे ही हैं। कहते हैं सेलेबल खबरें छापो बस।
मरने खपने में ज्यादा दम नहीं है। हां तो बात टारगेट आडिएंस की हो रही
थी। सामने वाले फ्लैट में कॉलसेंटर की लड़कियां रहती थीं। मैने अपने
रिपोर्टर के जरिए उन तक खबर पहुंचवा दी। काम हो गया लगता है। एक स्लीवलेस
लड़की वाइल्ड लाइफ प्रेमी निकली। घूरने की मेरे आदत से कुढ़ी रहने के बाद
भी वो बोल बैठी..वॉव..वॉव ओ माई गॉड कहां हैं एग्स। फिर मैंने कायदे से
ब्रीफ किया। कहा, घर आकर आप अंडे देख भी सकती हैं। छू भी सकती हैं। किचन
में मटर छील रही पत्नी को ये बड़ा नागवार लगा। उन्होने धीमे से उस लड़की को कोसा।
शायद आवारा कहा। वो भी कहा जो विभूति जी ने कहा था, लेखिकाओं के बारे में। मैंने भी अपने
चरित्र का दोगलापन दिखाया, खीस निपोरते हुए बोला आवारा तो हई हैं, बताओ
अंडे वाली बात बाद में तुमसे भी तो पूछ सकती थीं। हाहाहाहा...। कमाल है
भाई।
क्रमशः

Thursday, November 25, 2010

शहर में मैं

अवनीश भाई से यह कविता काफी मुश्किल से हासिल कर पाया। वह लिखते हैं लेकिन छपते नहीं हैं। कई बार मेरी जिद पर भी वह नहीं पसीजे तो मैं उनकी डायरी चुरा लाया हूं। यह कविता बानगी है। आगे भी दिया करूंगा। उनकी नदी पर लिखी कविताएं बहुत सुंदर हैं। उनके बारे में सिर्फ इतना कि बच्चों के लिए उनकी किताबें तैयार करते हैं और बेसिक शिक्षा विभाग में सर्वशिक्षा अभियान के जिला समन्वयक हैं।

एक पूरी शाम
मेरे घर में ठहरना चाहती थी
उन पंछियों की तरह
पूरी उडान की हौंस पूरी कर
जो टोह रहे होते हैं नीड
किसी भी ऋतु में

मगर मैं अपने घर में था ही कहां!

बचपन में एक बार खूब नाराज होकर
कहा था मां ने
देखना एक दिन तू मर जाएगा!

मैं नहीं जानता था तब
नहीं जानता था तब

मां को तब भी पता था

शहर में मेरे होने का मतलब
..................
डा. अवनीश यादव

Saturday, August 21, 2010

जंगली खरगोश जैसा प्यार

मैं किसे अपना हाजिर नाजिर मानूं
ईश्वर को

मैं आपको हाजिर नाजिर मानकर
कहता हूं कि
मैंने आपसे प्यार किया है
यह मेरा गुनाह है

इस वक्त नहीं है
मेरे पास कोई गवाह
मेरे पक्ष में
सभी ने सिल लिए हैं मुंह

मैं गीता की कसम खाकर
कहता हूं कि
जो कुछ कहूंगा
वह तुम्हारे प्यार की तरह
सच्चा होगा
एकदम खरा

और गवाहों की बात करूं तो
किसने देखा है
मुझे प्यार करते हुए
यानि अपराध करते हुए

इस अंधेरे समय में
कौन कहेगा कि
यह प्यार सच्चा है
इसे बखश दो मी लॉड

मेरे प्यार के पक्ष में
कोई गवाही नहीं आ रही है
जिसे बोलना था
उसे होठों पर हथकडियां हैं

खामोश अदालत जारी है

भद्रजनों
मुझे प्यार के अपराध के लिए
क्षमा करो
क्षमा करो
विप्र
मैं जोडने में गलती से
तोड बैठा हूं कुछ
जो मुझे नहीं मालूम

और न्याय की कुर्सी पर बैठे
राजा जी
हमेशा की तरह
मेरे प्यार को भी दे दो सजा-ए-मौत
लेकिन मेरा प्यार
जिंदा रहेगा
ओस की बूंदों में
जमुन जल में
शाखों में, बल्लरियों में
अमलताश में
पहाड की किसी हरियाली चोटी पर
सुबह उगेगा दूब-सा भीगा
सांझ को गायों के साथ लौट आएगा
दुबककर
धूल उडेगी
और समा जाएगा
मेरे अंतर के कोने-कोने में

प्यार
किसी जंगली खरगोश की तरह
मारेगा उछालें
नर्म-नर्म
नदी, पर्वत, खेत, खलिहान पार करता हुआ
आकर दुबक जाएगा
मेरी गोद में
गर्म-गर्म
प्यार मरेगा कहां।

- पंकज

Sunday, August 8, 2010

नदी

सुधीर विद्यार्थी की यह कविताएं कथादेश में छपी थी, अचानक नजर पडी तो इन्हें ब्लाग पर देने का मन हुआ। इन कविताओं को मरती हुई नदियों का बयान कहना ठीक होगा। अपनी राय दीजिएगा। -पंकज

जानवर ज़रूरत भर पानी
पी रहे हैं नदी से
चिड़िया चोंच भर पीती हैं
मछलियाँ और मगरमच्छ
गलफड़े भर कर
वृक्ष सोखते हैं
जड़ भर पानी
सूरज अपनी गर्मी भर पीकर
लौटा देता है बादलों को
पर मनुष्य को कितना पानी चाहिए
यह नदी भी नहीं जानती

दो

जंगल में रहकर नदी
जंगल नहीं हो जाती
जंगल के जंगलीपन के बावजूद
वह नहीं छोड़ देती
अपना नदी होना

तीन

नदी को पंडित जानते हैं
जानते हैं तिलकधारी पंडे
कथावाचक और हरबोले
तंबुओं के खूँटे गाड़ते मजदूर
प्रसाद की दुकानों पर बैठे
मैले-कुचैले हलवाई
लहरों को पतवार से चीरने वाले
मल्लाहों के काले चौड़े मज़बूत कंधे
नदी इन सबके लिए
कोई पवित्र शब्द नहीं
वह थाली में सजी
भूख भर रोटी है

चार

प्लास्टिक के टब में नदी भर कर
काग़ज़ की नाव उतार रहे हैं बच्चे
नाव, नदी और बच्चे
सभी खुश हैं
बच्चों के साथ रहकर
लौट आता है नदी का बचपन

पाँच

पाल लगी नावें
नदी की लहरों पर
हवा के रुख को देखकर
तैरती हैं
हवा बहा ले जाती है
अपने साथ नावों का काफ़िला
हवा के साथ-साथ
कभी नहीं चलती नदी

छह

कविता से गायब हो गई है नदी
छूट गई है नदी कविता से
एक संत कवि ने नदी के किनारे बैठकर
लिखी थीं कविताएँ
एक प्रयोगवादी कवि ने
नदी में खड़े होकर
पढ़ी थीं कविताएँ
फिर भी रूठ क्यों गई है नदी
कविता से

सात

नदी में दिखाई पड़ रहा है
हमारा चेहरा
नदी का बयान
हमारे समय पर
एक क्रूर टिप्पणी है

आठ

नदी आत्मकथा लिखना चाहती है
वह दर्ज़ करना चाहती है
अपने सारे सुख-दुख
जन्म से अब तक के
उल्लास, मिलन, बिछोह
विद्रोह और समर्पण
वह अपना अधूरापन
उगलना चाहती है
कहना चाहती है
कि उसका नदी होना
सबसे बड़ा अपराध है

नौ

नदी का संकट सिर्फ़ नदी का नहीं है
हमारे समय की सबसे भयानक खबर है यह
कि गाँव उजड़ रहे हैं
जंगल होते जा रहे हैं शहर
नदी को डंस रहे हैं
तरक्की के सबसे ज़हरीले साँप
नदी के खिलाफ़
हमारी पीढ़ी का
सबसे घिनौना षड़यंत्र है यह
नदी तुम बगावत क्यों नहीं करती
जीने के हक के लिए
दुनिया की सारी नदियों को एक हो जाना चाहिए

Saturday, February 27, 2010

बेटियां बेचैन हैं



बस चलनी शुरू हुई कि मेरी बेटी फफककर रो पड़ी। यह महानगर का सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाला बस स्टैंड है, जहां से मेरे गांव को जाने वाली बसें मिलती हैं। इन्हीं में से एक बस में मेरे पिताजी, पंद्रह दिन शहर में रहकर इलाज कराने केबाद गांव जा रहे थे। बस धीरे-धीरे आगे बढ़ी और ओझल होने लगी। मैं बेटी को चुप कराने में लगा था।
'कुछ चाहिए? ’ उसने रोते-रोते सिर हिला दिया। 'नहीं। ’
'फिर क्यों रो रहे हो बेटा। ’
'बाबा चले गए अब मुझे अच्छा नहीं लगेगा। ’
मेरी आंखें भर आईं। कितनी तन्हा है मेरी बेटी। मैं उसकी हिचकियां सुन रहा था। मैंने उसे सीने से लगा लिया, 'मैं तो हूं न! तुम मेरे साथ खेलना। ’
घर आया तो पत्नी ने बताया कि पिता जी इसके लिए घोड़ा बन जाते थे। रात को चांद तारों की कहानियां सुनाते। गाय-भैस-बछड़े, ताल तलैया से लेकर गन्ने और उससे गुड़ बनने जैसी बातें उन्होंने ही बेटी को बताईं। बाबा की बातें बेटी का 'कौतुहल लोक’ थीं। बाबा कुछ सुनाते तो वह मौन हो जाती। बड़े ध्यान से सुनती और सवाल करती, 'बाबा, मूली का पेड़ कैसा होता है?’
बाबा केसाथ खेलती तो अक्कड़-बक्कड़, गुट्टा-गुट्टी जैसे जाने कितने खेल जिंदा होते चले जाते। पिता जी मेरी बेटी का 'प्ले स्कूल ’ थे। शहर की तंग गली में मेरे उस छोटे से किराए केमकान में बेटी का 'पार्क’ थे, जहां वह जब चाहती, सैर कर आती। बेटी ने कभी गांव नहीं देखा। मैंने उसे दिखाने की कोशिश भी नहीं की। उसने कद्दू-लौकी, तोरई की छप्पर पर पसरी बेलें नहीं देखीं। 'सत्तू’ मेरे बचपन का 'फास्ट फूड’ था, वह नहीं जानती है। अम्मा चना, मटर, गेहूं, मकई पसेरी-पसेरी भुना कर रख देतीं थी। बस्ते में भरकर स्कूल ले जाते थे। बेटी चाउमिन लेकर स्कूल जाती है। बोलचाल की भाषा में जिसे जंक फूड कहते हैं। बताते हैं- यह सब खाने से बच्चे जल्दी जवान होने लगते हैं।
पिता को नहीं मालूम इस जंक फूड के खतरे, लेकिन बेटी को खाते देखते तो टोक देते, 'का बिटिया, जा कोई खान बारी चीज है। ’ एक दिन पिताजी कहीं से घूमकर बड़ी देर बाद लौटे। साथ में भुने हुए चने, मकई केफूले और खोए की बर्फी लेकर आए। बेटी ने सब चीजें बड़े मजे लेकर खाईं। पिता को खोए की मिठाई बहुत पसंद है। मैंने बचपन में उनकी लाई खोए की बर्फी खूब खाई है, जिस पर चांदी का चमचमाता बरक चिपका होता था। यहां महानगर में उन्होंने पता नहीं कितनी दुकानें बर्फी केलिए छानीं, तब कहीं से लेकर आए। गांव गए तो कहकर गए कि आलुओं की कोई कमी नहीं है। बड़ी अच्छी फसल हुई है इस बार। तुम्हारी दादी से कहकर पसेरी भर चिप्स बनवा दूंगा। ये चमचमा वाले इतने महंगे चिप्स मत खाया करो। सत्तू लेकर भी आएंगे।
अपने बचपन को याद करता हूं तो लगता है कि मेरे खाने का मेन्यू कब का खत्म हो गया। बेटी को बताऊं तो कहेगी कि ये भी कोई खाने वाली चीजें है पापा!
उस दिन मैंने पहली बार 'बेटियों’ के बारे में सोचा। मोहल्ले भर की बेटियों केबारे में...। घरों से 'बाबा’ खत्म होते जा रहे थे। बाबा गांव में पेंशन के सहारे जी रहे हैं। पेंशन से बचाकर बेटियों के लिए कुछ पैसे भेज देते हैं ताकि वे साइकिल खरीद लें। वीडियोगेम खरीद लें। बंद रिक्शे में स्कूल जाएं और सुरक्षित घर लौट आएं। जब चाहें पिज्जा-बर्गर खाएं।
बेटियां बेचैन हैं- बाबा, क्या तुम मुझे उंगली पकड़ाकर स्कूल छोडऩे नहीं जाओगे।
और अपने पापा की सुनो- जब तुम स्कूल जाती हो, उससे कुछ समय पहले रात के अंतिम पहर में मैं कारखाने से निचुड़कर लौटता हूं। तुम्हारा सोता हुआ चेहरा देखता हूं। तुम्हारे चेहरे पर कुछ 'ऊब ’ दिखती है। मैं बिस्तर पर गिर जाता हूं-अधमरा-सा। सुबह इन्हीं मरे हुए क्षणों में मुझे तुम्हारी 'बाय ’ सुनाई देती है। देवव्रत जोशी की कविता कौंधती है- 'बाप से आंख नहीं मिला पाया आजीवन/जबकि सहज थे वे/हवा-पानी-मिट्टी और आकाश की तरह/तरल, पारदर्शी और अहेतुक प्रेमी/उसी स्वभाव की पोती से/आंखें चुराता हूं/फिलवक्त पिता की कुर्सी पर बैठी वह/आज वह मुझे बेतरह मुग्ध और शर्मसार कर रही है। ’

(उदयप्रकाश की कहानी 'तिरिछ ’ पढ़ते हुए स्मृतिविहीन हो चुकेपिता याद आए। यह भी याद आया कि खुद मैं भी स्मृतिविहीन हो गया हूं। एक दिन अपनी अखबारनवीसी की कतरनें टटोलते हुए यह कतरन हाथ लग गई। 10 जनवरी, 2008 को जनसत्ता के 'दुनिया मेरे आगे ’ कॉलम में छपी थी।)

Tuesday, September 22, 2009


मेरे

हमराही भानु की खींची हुयी यह तस्वीर गहरायी से महसूस कीजिए /

Monday, September 14, 2009

तुम बड़ी रंगरेज हो कनुप्रिया

बीते दिनों की झिलमिल यादों से बावस्ता हूं। अकस्मात एक सिहरन उठती है, यह क्या है। हंस की मनुहार 'अब हेमंत अंत निअराया, लौट न आ तू गगन बिहारी। ’ जमीन टेरती है। पलाश खिले हैं, सेंमल खिले हैं। आम बौराए हैं। गेहूं हरिआये हैं। एक रंग उतर रहा है...एक रंग चढ़ रहा है। मखमली-सा, जिसे छुओ तो पोर-पोर सनक जाए और इसमें डुबकी लगा लो तो खनक दूर तलक जाए।
वे कैसे दिन थे।
लंबी सांस खींचता हूं तो अब भी वह सोंधापन गमकता चला आता है।
मैं खुद को 20 साल पीछे ढकेलना चाहता हूं।
मुझे नहीं पता मैं क्यों ऐसा करना चाहता हूं। कोई मुझे टेर रहा है। कभी ऐसा हो कि नदी बहती हुई सहसा पीछे मुड़ जाए। या उल्टी दिशा में बहने लगे और वही पहुंचे, जहां से चली थी। फिर से बहने की शुरूआत करे। ये बहना वैसा न हो, पहले जैसा। कुछ न रीते।
जीवन भी ऐसा हो जो क्या कहने-रिवर्स।
हो सकता है- मैं उनको प्यार कर सकूं, जिनको किनारे पर छोड़ आए। हो सकता है- वे आंखें अब भी इंतजार में हों और हम निर्मोही यहां भटक रहे हैं। हां, हम निर्मोही है, बहुत जल्दी भूल जाते हैं।
प्रिया प्रतीक्षारत है-कनु तुम कहां हो।
धर्मवीर भारती की 'कनुप्रिया’ मेरे हाथों में है।
मन के अरसे से बंद दरवाजों की सांकल कोई गहरे से खटका रहा है। मैं सुन रहा हूं....मैं सुन रहा हूं तुम्हें। तुम्हारे हाथों की छुअन से सांकल देर तक नाचती रहेगी। मन में मैं भी नाच रहा हूं।

बड़ी बावरी हो तुम भी
चलो, मैं खोल ही देता हूं मन के दरवाजे। उदासी के इस घने अंधेरे में कुछ पल तुम्हारे साथ महकते हुए बीतेंगे। मन फगुनाया है। कोई मुझसे घड़ी, घंटे, पल-छिन...सब छीन ले। किसी ऐसे अंधेरे कमरे में डाल दे, जहां एक खिड़की पूरब की ओर खुलती हो। मेरे नथुनों में हवा समाएगी और मैं जान जाऊंगा कि बसंत आ गया है और फागुन आने वाला है। मौसम दिलों में रहते हैं...कलेंडर...इंटरनेट या डायरी में नहीं। रंग भी दिल में बसते हैं...मन न रंगाय...रंगाय जोगी कपड़ा। ये जो पुरबा बयार चली है...इसमें तुम्हार देहराग मिला हुआ है। मैं उसी रंग में रंग जाऊंगा..बेसुध हो जाऊंगा। ये चंपई उजास चमकी है..तुम्हारे जैसी।
तुम्हारी आवाज एक गहरा आलाप है। मुझे मदोन्मत्त कर रही है। मैं इस मद में पागल हो जाना चाहता हूं। फागुन का नाम पागल होता तो और उसे जीने वाले सब पगले।
जोगी री सा रा रा रा।
तुम बड़ी रंगरेज हो कनुप्रिया। ऐसा रंग दिया कि जनम भर न उतरे।
और मैं क्या कहूं...।
'इश्किया ’ में गुलजार साब की ये लाइन कह दूं तो चलेगा-
दिल तो बच्चा है जी...।